शायर : तिलकचंद कौसर
; तर्ज़ : उ.
फ़ैय्याझ़ हुसैन ख़ाँ ; ताल
: झपताल
Lyrics :
क़रार शबके लिये , राहतें सहरके लिये
। तरस रहा हूँ मुहब्बतकी इक
नज़रके
लिये ।।
डुबोके ख़ूनमें नग़मा कोई सुना बुलबुल
। गुलोंका काफ़ला तैय्यार है सफ़रके
लिये ।।
मेरी निगाहोंसे छुपकर न रह सकोगे
कहीं । तुम्हें बनाया गया है मेरी
नज़रके
लिये ।।
ग़ज़लमें बंदिशें अल्फ़ाज़ही नहीं काफ़ी ।
जिगरका ख़ूनभी कुछ चाहिये असरके लिये ।।
झुका दिया है जिसे तेरे ग़मके
एहेसाँने । वो सर उठा न सकूँगा
मैं
उम्रभरके लिये ।।
तरस रहा हूँ मुहब्बतकी इक नज़रके
लिये । क़रार शबके लिये , राहतें सहरके
लिये ।।
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